Tuesday, November 15, 2011
निंदा करने वाले चांडाल होते हैं / चाणक्य
मुनीनाम कोप चांडाल:, सर्वेषा चैव निंदक : । ।
पक्षियों में कौवा चांडाल होता है।
पशुओं में कुत्ता चांडाल होता है।
मुनियों में क्रोध करने वाले चांडाल होते हैं।
सबकी निंदा करने वाले भी चांडाल होते हैं।
--पुस्तक : चाणक्य नीति , पृष्ठ-४०
संपादक -अशोक लव
Saturday, November 12, 2011
जल और हीरा
Friday, November 11, 2011
Thursday, November 10, 2011
भारतीय शिक्षा पद्धति और संस्कृति को मिटाओ / लार्ड मेकाले
“I have traveled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a beggar, who is a thief, such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation”
11.11.11 अद्भुत सुखमय संयोग
हजारों वर्ष के बाद 11 इक्कों का अद्भुत संयोग बन रहा है। 11 नवंबर को एक समय ऐसा भी आएगा, जब 12 बार एक पंक्ति में 1 का अंक नजर आएगा। ज्योतिष में एक का विशेष महत्व है, क्योंकि एक अंक के स्वामी सूर्यदेव है जबकि इसके मूलांक का स्वामी चंद्रदेव है।
11 नवंबर 2011, दिन शुक्रवार, कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि, भरणी एवं कृतिका नक्षत्र के दिन अंकों की दुनिया में शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण संयोग निर्मित हो रहा है। जब 11 तारीख, 11वां महीना के अलवा 11वां वर्ष भी होगा। इस दिन घड़ी की सुई जब 11 बजकर 11 मिनट और 11 सेकंड पर होगी। तब तारीख व समय के अंकों से बारह इक्कों का निर्माण होगा।
धर्म, आध्यात्म एवं ज्योतिष जगत में 11 नंबर का विशेष महत्व है। इस अंक में एक अंक का दो बार प्रयोग हुआ है। एक अंक का स्वामी सूर्यदेव है और जिसे ग्रहों का राजा माना गया है। अंक 11 का मूलांक दो है और अंक दो का स्वामी चंद्रदेव है। इस प्रकार अंक 11 को सूर्य और चंद्रदेव दोनों का आशीर्वाद प्राप्त है।
अंक 11 के आधार पर तिथियों में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है और संपूर्ण तिथियों में एकादशी तिथि को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।
यदि 11 नवंबर 2011 को जोड़कर मूलांक निकाला जाए तो 6 आता है। इस अंक के स्वामी शुक्रदेव है और इस दिन शुक्रवार भी है। शुक्रदेव को सांसारिक सुखों, वैभव और ऐश्वर्य का कारक माना गया गया है। इसी तरह यदि 11 नवंबर की तारीख और समय का मूलांक जोड़ा जाए तो मूलांक 3 आता है, इस अंक के स्वामी देवगुरु बृहस्पति है। बृहस्पति को धार्मिक एवं आध्यात्मिक उन्नति का कारक माना जाता है। इस तारीख को सूर्यदेव एवं चंद्रदेव के साथ-साथ बृहस्पति और शुक्र की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
इस शताब्दी का यह एकमात्र दिन होगा जब 12 अंकों का संयोग निर्मित होगा। इससे पूर्व भी अंकों का एक क्रम 9 अक्टूबर 2011 को भी निर्मित हुआ था जब 9, 10 और 11 के अंक एक क्रम में आए थे, परंतु अंकों की समानता का यह रोमांचकारी संयोग हजारों वर्ष में एक बार ही निर्मित हो रहा है। लिहाजा एक अंक का यह समुच्चय इस तारीख एवं तिथि के लिए कई हजार गुना खुशियां लेकर आने वाला है।
एक ओंकार सतिनाम, करता पुरखु निरभऊ।
एक ओंकार सतिनाम, करता पुरखु निरभऊ।
निरबैर, अकाल मूरति, अजूनी, सैभं गुर प्रसादि ।।
हुकमी उत्तम नीचु हुकमि लिखित दुखसुख पाई अहि।
इकना हुकमी बक्शीस इकि हुकमी सदा भवाई अहि ॥
सालाही सालाही एती सुरति न पाइया।
नदिआ अते वाह पवहि समुंदि न जाणी अहि ॥
पवणु गुरुवाणी पिता माता धरति महतु।
दिवस शति दुई दाई दाइआ खेले सगलु जगतु ॥
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हरि बिनु तेरो को न सहाई।
काकी मात-पिता सुत बनिता, को काहू को भाई॥
धनु धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई।
तन छूटै कुछ संग न चालै, कहा ताहि लपटाई॥
दीन दयाल सदा दु:ख-भंजन, ता सिउ रुचि न बढाई।
नानक कहत जगत सभ मिथिआ, ज्यों सुपना रैनाई॥
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जगत में झूठी देखी प्रीत।
अपने ही सुखसों सब लागे, क्या दारा क्या मीत॥
मेरो मेरो सभी कहत हैं, हित सों बाध्यौ चीत।
अंतकाल संगी नहिं कोऊ, यह अचरज की रीत॥
मन मूरख अजहूँ नहिं समुझत, सिख दै हारयो नीत।
नानक भव-जल-पार परै जो गावै प्रभु के गीत॥
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कार्तिक पूर्णिमा संवत २०६८ , दस नवम्बर २०११ श्री गुरु नानक साहिब जी जन्मोत्सव
Wednesday, November 9, 2011
शीलं च दुर्लभं तत्र विनयस्तत्र....
शीलं च दुर्लभं तत्र विनयस्तत्र सुदुर्लभः॥
In this world, to take birth in the human race is rare, wherein to obtain knowledge and wisdom is even harder. Further to have a noble character is harder and further still is modesty.
चुकंदर से लाभ ही लाभ

| Amit Chhibber | 10:28pm Nov 8 |
शायद कम लोग ही जानते हैं कि चुकंदर में लौह तत्व की मात्रा अधिक नहीं होती है, किंतु इससे प्राप्त होने वाला लौह तत्व उच्च गुणवत्ता का होता है, जो रक्त निर्माण के लिए विशेष महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि चुकंदर का सेवन शरीर से अनेक हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालने में बेहद लाभदायी है।
चुकंदर के संबंध में एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इसके कंद के अलावा चुकंदर की हरी पत्तियों का सेवन भी बेहद लाभदायी है। इन पत्तियों में कंद की तुलना में तीन गुना लौह तत्व अधिक होता है। पत्तियों में विटामिन ए भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
कंद व इसकी पत्तियां रक्त निर्माण के लिए व हानिकारक तत्वों को शरीर से बाहर निकालने अर्थात "क्लींजर" के रूप में कार्य करते हैं। चुकंदर में पोटेशियम, सोडियम, कैल्शियम, मैग्नीज व रेशे की पर्याप्त मात्रा होती है। पाचन योग्य शर्करा की उपस्थिति के कारण चुकंदर का सेवन ऊर्जा भी प्रदान करता है।
ऐसा समझा जाता है कि चुकंदर का गहरा लाल रंग इसमें लौह तत्व की प्रचुरता के कारण है, बल्कि सच यह है कि चुकंदर का गहरा लाल रंग इसमें पाए जाने वाले एक रंगकण (बीटा सायनिन) के कारण होता है। एंटी ऑक्सीडेंट गुणों के कारण ये रंगकण स्वास्थ्य के लिए अच्छे माने जाते हैं।
चुकंदर में पाए जाने वाले फोलिक एसिड, पोटेशियम व मुलायम रेशा भी इसके पोषणिक गुणों को बढ़ाते हैं। चुकंदर का नियमित सेवन संपूर्ण शरीर को निरोग रखने में सहायक है।
हालांकि हमारे दैनिक आहार में चुकंदर को अभी भी उचित स्थान प्राप्त नहीं है, फिर भी इसे नियमित खाने से ना सिर्फ कई रोगों में लाभ होता है बल्कि यह त्वचा की खूबसूरती भी प्रदान करता है। इससे हिमोग्लोबिन बढ़ता है फलस्वरूप चेहरे की लालिमा बढ़ती है।
*फेसबुक से
Tuesday, November 8, 2011
हिन्दू धर्म जीवन का मार्ग

| Chandresh Upadhyay |
हिंदू मंदिर, श्री लंकाहिन्दू धर्म में कोई एक अकेले सिद्धान्तों का समूह नहीं है जिसे सभी हिन्दुओं को मानना ज़रूरी है। ये तो धर्म से ज़्यादा एक जीवन का मार्ग है। हिन्दुओं का कोई केन्द्रीय चर्च या धर्मसंगठन नहीं है, और न ही कोई "पोप"। इसके अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं, और सभी को बराबर श्रद्धा दी जाती है। धर्मग्रन्थ भी कई हैं। फ़िर भी, वो मुख्य सिद्धान्त, जो ज़्यादातर हिन्दू मानते हैं, हैं इन सब में विश्वास : धर्म (वैश्विक क़ानून), कर्म (और उसके फल), पुनर्जन्म का सांसारिक चक्र, मोक्ष (सांसारिक बन्धनों से मुक्ति--जिसके कई रास्ते हो सकते हैं), और बेशक, ईश्वर। हिन्दू धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थायी मानता है। हिन्दू धर्म के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में आत्मा होती है। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है, और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। हिन्दू धर्म में चार मुख्य सम्प्रदाय हैं : वैष्णव (जो विष्णु को परमेश्वर मानते हैं), शैव (जो शिव को परमेश्वर मानते हैं), शाक्त (जो देवी को परमशक्ति मानते हैं) और स्मार्त (जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं)। लेकिन ज्यादातर हिन्दू स्वयं को किसी भी सम्प्रदाय में वर्गीकृत नहीं करते हैं। प्राचीनकाल और मध्यकाल में शैव, शाक्त और वैष्णव आपस में लड़ते रहते थे. जिन्हें मध्यकाल के संतों ने समन्वित करने की सफल कोशिश की और सभी संप्रदायों को परस्पर आश्रित बताया.
संक्षेप में, हिन्दुत्व के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं-हिन्दू-धर्म हिन्दू-कौन?-- गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवे च दृढ़ा मतिः। पुनर्जन्मनि विश्वासः स वै हिन्दुरिति स्मृतः।। अर्थात-- गोमाता में जिसकी भक्ति हो, प्रणव जिसका पूज्य मन्त्र हो, पुनर्जन्म में जिसका विश्वास हो--वही हिन्दू है। मेरुतन्त्र ३३ प्रकरण के अनुसार ' हीनं दूषयति स हिन्दु ' अर्थात जो हीन ( हीनता या नीचता ) को दूषित समझता है (उसका त्याग करता है) वह हिन्दु है। लोकमान्य तिलक के अनुसार- असिन्धोः सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।। अर्थात्- सिन्धु नदी के उद्गम-स्थान से लेकर सिन्धु (हिन्द महासागर) तक सम्पूर्ण भारत भूमि जिसकी पितृभू (अथवा मातृ भूमि) तथा पुण्यभू ( पवित्र भूमि) है, ( और उसका धर्म हिन्दुत्व है ) वह हिन्दु कहलाता है। हिन्दु शब्द मूलतः फा़रसी है इसका अर्थ उन भारतीयों से है जो भारतवर्ष के प्राचीन ग्रन्थों, वेदों, पुराणों में वर्णित भारतवर्ष की सीमा के मूल एवं पैदायसी प्राचीन निवासी हैं। कालिका पुराण, मेदनी कोष आदि के आधार पर वर्तमान हिन्दू ला के मूलभूत आधारों के अनुसार वेदप्रतिपादित रीति से वैदिक धर्म में विश्वास रखने वाला हिन्दू है। यद्यपि कुछ लोग कई संस्कृति के मिश्रित रूप को ही भारतीय संस्कृति मानते है, जबकि ऐसा नही है। जिस संस्कृति या धर्म की उत्पत्ती एवं विकास भारत भूमि पर नहीं हुआ है, वह धर्म या संस्कृति भारतीय ( हिन्दू ) कैसे हो सकती है।
1. ईश्वर एक नाम अनेक2. ब्रह्म या परम तत्त्व सर्वव्यापी है3. ईश्वर से डरें नहीं, प्रेम करें और प्रेरणा लें4. हिन्दुत्व का लक्ष्य स्वर्ग-नरक से ऊपर5. हिन्दुओं में कोई एक पैगम्बर नहीं है, बल्कि अनेकों पैगंबर हैं.6. धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर बार-बार पैदा होते हैं7. परोपकार पुण्य है दूसरों के कष्ट देना पाप है.8. जीवमात्र की सेवा ही परमात्मा की सेवा है9. स्त्री आदरणीय है10. सती का अर्थ पति के प्रति सत्यनिष्ठा है11. हिन्दुत्व का वास हिन्दू के मन, संस्कार और परम्पराओं में12. पर्यावरण की रक्षा को उच्च प्राथमिकता13. हिन्दू दृष्टि समतावादी एवं समन्वयवादी14. आत्मा अजर-अमर है15. सबसे बड़ा मंत्र गायत्री मंत्र16. हिन्दुओं के पर्व और त्योहार खुशियों से जुड़े हैं17. हिन्दुत्व का लक्ष्य पुरुषार्थ है और मध्य मार्ग को सर्वोत्तम माना गया है
18 हिन्दुत्व एकत्व का दर्शन है
--फेसबुक से
Monday, November 7, 2011
मोहयाल सभा फरीदाबाद का मोहयाल बाल मेला / पुनीत दत्ता
इस अवसर पर दो वर्ष से लेकर पंद्रह वर्ष की आयु के बच्चों ने विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लिया।
प्रतियोगिताएँ थीं--फैंसी ड्रेस , कविता पाठ और चित्रकला।
इस अवसर पर बोलते हुए मुख्य-अतिथि श्री अशोक लव ने कहा कि यह देखकर प्रसन्नता हो रही है कि बच्चों में इतना उत्साह और प्रतिभा है। नन्हें-नन्हें बच्चों ने बिना झिझक कविताएँ सुनाईं, विश्वासपूर्वक फैंसी ड्रेस शो भागलिया। उनके द्वारा बनाए गए चित्रों को देखकर उनकी कल्पना शक्ति का पता चलता लगता है। सभी बच्चों ने चित्रकला -प्रतियोगिता में भाग लिया है। इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित होते रहने चाहिएँ। आजकल बच्चे अधिक सजग और प्रतिभाशाली हैं। माता-पिता भी उन्हें प्रोत्साहित करते हैं।
Saturday, November 5, 2011
सा विद्या या विमुक्तये
Thursday, November 3, 2011
मेहता ओ पी मोहन , वरिष्ठ उपाध्यक्ष जनरल मोहयाल सभा , का 90 वाँ जन्म-दिन

चित्र में -यागेश मेहता , अशोक लव,मेजर एस एस दत्ता, रायजादा बी डी बाली, जे सी बाली और श्री ओ पी मोहन
मेहता ओ पी मोहन (वरिष्ठ उपाध्यक्ष जनरल मोहयाल सभा ) का 90 वाँ जन्म-दिन छह अक्तूबर को मनाया गया। मेहता ओ पी मोहन के निवास फरीदाबाद में संकीर्तन और प्रीति -भोज के साथ इसे मनाया गया
16 अक्तूबर को रायजादा बी डी बाली ने अपने निवास पर पार्टी दी। उसी समय के चित्र। चित्र में रायजादा बी डी बालीउन्हें केक खिलते हुए। साथ में एस एन दत्ता और अशोक लव ।
Kanimozhi's bail rejected :Judge's strong comments
Judge's strong words on why he denied Kanimozhi bail
Neha Khanna November 03, 2011

From Judge OP Saini's order:
- Accused Kanimozhi belongs to upper echelons of the socierty and is also a Member of Parliament
- By no stretch of imagination she can be said to be suffering from any discrimination on ground of being a woman
- Witnesses should have sense of safety and security - one way of generating this is to keep the accused in the custody
- Their ultimate objective was to use public money in carefully planned manner for personal use with no right to do it
- The order is given solely keeping in mind the facts and circumstances of the case, keeping the best interest of justice in mind
- No opposition from the CBI to their bail but that doesn't have any bearing on this case
- The facts of the case as well as the charges levelled against the accused are of very serious nature having grave implications for the economy of the country
- The persons involved in such offenses, particularly those who continue to reap the benefits of the crime committed by them, do not deserve any indulgence; and any sympathy to them not only being entirely misplaced but also against the larger interest of the society the court cannot be oblivious to the fact that such offenses are preceded by cool, calculated and deliberate design with an eye on personal gains and in fact not all such offenses come to the surface.
- If a person knows that even after misappropriating huge public funds, he can come out on bail, after spending a few months in jail, and thereafter he can continue to enjoy the ill-gotten wealth obtained by illegal means, that would only encourage many others to commit similar crimes in the belief that even if they have to spend a few months in jail, they can lead lavish and comfortable lives thereafter, utilizing the public funds acquired by them. In fact, not everyone would mind luxurious living for him and his family, even if it comes at the cost of spending a few months in jail. A strong message therefore needs to be sent to these white-collared criminals and those who are waiting in the wings that in the long run, it does not pay to be on the wrong side of the law.
- The community or the state is not persona non-grata whose cause may be treated with disdain. The entire community is aggrieved if economic offenders who ruin the economy of the state are not brought to book.
3rd November 2011
Wednesday, November 2, 2011
छठ पर्व / अशोक मेहता
प्रकृति एवं लोक आस्था का अनोखा त्योहार और व्रत हमारे देश में सूर्योपासना के लिए छठ पर्व के रूप में मनाया जाता है| सूर्य की उपासना से मनुष्य प्रत्येक प्रकार की बीमारी ( विशेष रूप से कुष्ट रोग) से मुक्ति पाता है तथा दीर्घकालिक जीवन प्राप्त करता है| यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है । पहली बार चैत्र माह में और दूसरी बार कार्तिक माह में । चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिक छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख सम्रिधि तथा मनोवांछित फलप्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है । ऐसी मान्यता है कि सूर्य देव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है| सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत">भारत के बिहार">बिहार, झारखण्ड">झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश">उत्तर प्रदेश और अब तो विश्वभर में विभिन्न क्षेत्रों में मनाया जाता है। प्रायः हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले इस पर्व को मुस्लिम भाई बहनों सहित अन्य धर्मावलंवी भी मनाते देखे गए हैं।[ छठ व्रतके संबंध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं; उनमें से एक कथाके अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुएमें हार गए, तब द्रौपदीने छठ व्रत रखा । तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवोंको राजपाट वापस मिल गया । इस सम्बन्ध में छठ पूजा के इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो इसका प्रारंभ महाभारत काल में कुंती द्वारा सूर्य की आराधना व पुत्र कर्ण के जन्म के समय से माना जाता है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या तालाब के किनारे यह पूजा की जाती है। लोक परंपराके अनुसार लोक मातृका षष्ठीकी पहली पूजा सूर्यने ही की थी । इसीलिये यह पर्व ‘सूर्यषष्ठी’ के नामसे विख्यात है। रामायण काल में सीता ने गंगा तट पर छठ पूजा की थी। एक मान्यता के अनुसार लंका">लंका विजय के बाद रामराज्य">रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी (पृष्ठ मौजूद नहीं है)">कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम">राम और माता सीता">सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशिर्वाद प्राप्त किया था।एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल (पृष्ठ मौजूद नहीं है)">महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण">कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है। प्राचीनकाल से अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए भारतीय स्त्रियां नियमित सूर्य पूजा करती थीं। दिवाली के ठीक छह दिन बाद मनाए जाने वाले छठ महापर्व का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को सूर्य षष्ठी का व्रत करने का विधान है । अथर्ववेद में भी इस पर्व का उल्लेख है। यह ऐसा पूजा विधान है जिसे वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाभकारी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से की गई इस पूजा से मानव की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। छठ पूजा का संबंध हठयोग से भी है। जिसमें बिना भोजन ग्रहण किए हुए लगातार पानी में खड़ा रहना पड़ता है, जिससे शरीर के अशुद्ध जीवाणु परास्त हो जाते हैं। इसे करने वाली स्त्रियाँ एवम पुरुष धन-धान्य, संतान सुख तथा सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहती हैं। प्राचीन काल में इसे बिहार और उत्तर प्रदेश में ही मनाया जाता था। लेकिन आज इस प्रान्त के लोग विश्व में जहाँ भी रहते हैं वहाँ इस पर्व को उसी श्रद्धा और भक्ति से मनाते हैं। यह व्रत बडे नियम तथा निष्ठा से किया जाता है। इसमे तीन दिन के कठोर उपवास का विधान है । इस व्रत को करने वालों को पंचमी को एक बार नमक रहित भोजन करना पडता है। षष्ठी को निर्जल रहकर व्रत करना पडता है । षष्ठी को अस्त होते हुए सूर्य को विधिपूर्वक पूजा करके अर्घ्य दिया जाता है। सप्तमी के दिन प्रात:काल नदी या तालाब पर जाकर स्नान किया जाता है। सूर्योदय होते ही पानी में खड़े होकर अर्घ्य देकर जल ग्रहण करके व्रत को खोलते हैं। प्रथम अर्घ्यसे पूर्व मिट्टी की प्रतिमा बनाकर षष्ठी देवीका आवाहन एवं पूजन करते हैं। पुनः प्रातः अर्घ्यके पूर्व षष्ठीदेवीका पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। इसके लिए विशेष वैदिक मंत्रों से भगवान सूर्य का आवाहन नहीं किया जाता है बल्कि गावों देहातों में गाये जाने वाले गीतों और भजनों से भगवान भास्कर को प्रसन्न किया जाता है|मान्यता है कि पंचमीके सायंकाल से ही घरमें भगवती षष्ठी का आगमन हो जाता है। इस प्रकार भगवान् सूर्यके इस पावन व्रतमें शक्ति और ब्रह्म दोनोंकी उपासनाका फल एक साथ प्राप्त होता है । यह पर्व चार दिनोंका है । भैया दूजके तीसरे दिनसे यह आरंभ होता है । पहले दिन सैंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दूकी सब्जी प्रसादके रूपमें ली जाती है । अगले दिनसे उपवास आरंभ होता है । इस दिन रातमें खीर बनती है । व्रतधारी रात में यह प्रसाद लेते हैं । तीसरे दिन अस्ताचल सूर्य की अंतिम रश्मि को अर्घ्य अर्पण करते हैं । अंतिम दिन उगते हुए सूर्य की प्रथम रश्मि को अर्घ्य एवम दूध चढ़ाते हैं । इस पूजामें पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्ज्य है| मान्यता ऐसी भी है कि मन में कोई खोट अथवा विकार होने पर इसका प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकता है। इस पर्व को मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि जबसे सृष्टि बनी, तभी से सूर्य वरदान के रूप में हमारे सामने हैं और तभी से उनका पूजन होता आ रहा है। प्राचीन काल में माया सभ्यता, आर्य, यूनानी, पारसी धर्म तथा और भी बहुत से धर्मो में भी सूर्य की उपासना की जाती थी| इस त्योहार का उद्देश्य घर-परिवार की सुख- समृद्धि और आरोग्यता पति, पत्नी, पुत्र, पौत्र,पुत्री, दामाद एवम सेवक,सेविका की प्राप्ति सहित सभी परिजनों के लिए मंगल कामना से जुड़ा हुआ है।
ऐसी मान्यता है कि भगवान भास्कर की पूजा एवम अर्ध्य देते समय आदित्यह्रदय स्तोत्र का उच्चारण करना बहुत लाभदायक होता है| (राउरकेला ओडिशा )






