Friday, January 22, 2010
स्वर्गीय एल के बक्षी : यात्रा संस्मरण लेखक
मोहयालों की शान वखरी : चित्रों में मोहयाल
Thursday, January 21, 2010
ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा
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| ब्रज भूमि भगवान् श्रीकृष्ण एवं उनकी शक्ति राधा रानी की लीला भूमि है। यह चौरासी कोस की परिधि में फैली हुई है। यहां पर राधा-कृष्ण ने अनेकानेक चमत्कारिकलीलाएं की हैं। सभी लीलाएं यहां के पर्वतों, कुण्डों, वनों और यमुना तट आदि पर की गई। पुराणों में ब्रज भूमि की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। ऐसा माना जाता है कि राधा-कृष्ण ब्रज में आज भी नित्य विराजते हैं। अतएव, उनके दर्शन के निमित्त भारत के समस्त तीर्थ यहां विराजमान हैं। यही कारण है कि इस भूमि के दर्शन करने वाले को कोटि-कोटि तीर्थो का फल प्राप्त होता है। ब्रज रज की आराधना करने से भगवान् श्री नन्द नन्दन व श्री वृषभानुनंदिनी के श्री चरणों में अनुराग की उत्पत्ति व प्रेम की वृद्धि होती है। साथ ही ब्रज मण्डल में स्थित श्रीकृष्ण लीला क्षेत्रों के दर्शन मात्र से मन को अभूतपूर्व सुख-शांति व आनन्द की प्राप्ति होती है। इसीलिए असंख्य रसिक भक्त जनों ने इस परम पावन व दिव्य लीला-भूमि में निवास कर प्रिया-प्रियतम का अलौकिक साक्षात्कार करके अपना जीवन धन्य किया है। वस्तुत:इस भूमि का कण-कण राधा-कृष्ण की पावन लीलाओं का साक्षी है। यही कारण है कि समूचे ब्रज मण्डल का दर्शन व उसकी पूजा करने के उद्देश्य से देश-विदेश से असंख्य तीर्थ यात्री यहां वर्ष भर आते रहते हैं। ब्रज चौरासी कोस में उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले के अलावा हरियाणा के फरीदाबाद जिले की होडलतहसील और राजस्थान के भरतपुरजिले की डीगव कामवनतहसील का पूरा क्षेत्रफल आता है। ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा के अंदर 1300से अधिक गांव, 1000सरोवर, 48वन, 24कदम्ब खण्डियां,अनेक पर्वत व यमुना घाट एवं कई अन्य महत्वपूर्ण स्थल हैं। ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा वर्ष भर चलती रहती हैं, किंतु दीपावली से होली तक मौसम की अनुकूलता के कारण प्रमुख रूप से चलती है। इन पद यात्राओं में देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए हजारों तीर्थ यात्री जाति, भाषा और प्रान्त की सीमाओं को लांघ कर प्रेम, सौहार्द्र,श्रद्धा, विश्वास, प्रभु भक्ति और भावनात्मक एकता आदि अनेक सद्गुणों के जीवन्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। साथ ही ब्रज संस्कृति से वास्तविक साक्षात्कार भी होता है। इन यात्राओं में राधा-कृष्ण लीला स्थली, नैसर्गिक छटा से ओत-प्रोत वन-उपवन, कुंज-निकुंज, कुण्ड-सरोवर, मंदिर-देवालय आदि के दर्शन होते हैं। इसके अलावा सन्त-महात्माओं और विद्वान आचार्यो आदि के प्रवचन श्रवण करने का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। पुराणों में ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा का विशेष महत्व बताया गया है। कहा गया है, ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा को लगाने से एक-एक कदम पर जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह भी कहा गया है, ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा चौरासी लाख योनियों के संकट हर लेती है। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि इस परिक्रमा के करने वालों को एक-एक कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। साथ ही जो व्यक्ति इस परिक्रमा को लगाता है, उस व्यक्ति को निश्चित ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। गर्ग संहिता में कहा गया है कि एक बार नन्द बाबा व यशोदा मैया ने भगवान् श्रीकृष्ण से चारों धामों की यात्रा करने हेतु अपनी इच्छा व्यक्त की थी। इस पर भगवान् श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि आप वृद्धावस्था में कहां जाएंगे! मैं चारों धामों को ब्रज में ही बुलाए देता हूं। भगवान् श्रीकृष्ण के इतना कहते ही चारों धाम ब्रज में यत्र-तत्र आकर विराजमान हो गए। तत्पश्चात यशोदा मैया व नन्दबाबाने उनकी परिक्रमा की। वस्तुत:तभी से ब्रज में चौरासी कोस की परिक्रमा की शुरुआत मानी जाती है। यह परिक्रमा पुष्टि मार्गीयवैष्णवों के द्वारा मथुरा के विश्राम घाट से एवं अन्य सम्प्रदायों के द्वारा वृंदावन में यमुना पूजन से शुरू होती है। ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा लगभग 268कि.मी. अर्थात् 168मील की होती है। इसकी समयावधि 20से 45दिन की है। परिक्रमा के दौरान तीर्थयात्री भजन गाते, संकीर्तन करते और ब्रज के प्रमुख मंदिरों व दर्शनीय स्थलों के दर्शन करते हुए समूचे ब्रज की बडी ही श्रद्धा के साथ परिक्रमा करते हैं। कुछ परिक्रमा शुल्क लेकर, कुछ नि:शुल्क निकाली जाती हैं। एक दिन में लगभग 10-12कि.मी. की परिक्रमा होती है। परिक्रमार्थियोंके भोजन व जलपान आदि की व्यवस्था परिक्रमा के साथ चलने वाले रसोडोंमें रहती है। परिक्रमा के कुल जमा 25पडाव होते हैं। आजकल समयाभाव व सुविधा के चलते वाहनों के द्वारा भी ब्रज चौरासी कोस दर्शन यात्राएं होने लगी हैं। इन यात्राओं को लक्जरी कोच बसों या कारों से तीर्थयात्रियों को एक हफ्ते में समूचे ब्रज चौरासी कोस के प्रमुख स्थलों के दर्शन कराए जाते हैं। यात्राएं प्रतिदिन प्रात:काल जिस स्थान से प्रारम्भ होती हैं, रात्रि को वहीं पर आकर समाप्त हो जाती हैं। |
श्री दुर्गा चालीसा
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| नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अंबे दुख हरनी॥ निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥ ससि ललाट मुख महा बिसाला। नेत्र लाल भृकुटी बिकराला॥ रूप मातु को अधिक सुहावे। दरस करत जन अति सुख पावे॥ तुम संसार शक्ति लय कीन्हा। पालन हेतु अन्न धन दीन्हा॥ अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥ प्रलयकाल सब नासन हारी। तुम गौरी शिव शङ्कर प्यारी॥ शिवजोगी तुम्हरे गुन गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥ रूप सरस्वति को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन्ह उबारा॥ धरा रूप नरसिंह को अंबा। परगट भई फाड कर खंबा॥ रच्छा करि प्रह्लाद बचाओ। हिरनाकुस को स्वर्ग पठायो॥ लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥ छीर सिन्धु में करत बिलासा। दया सिन्धु दीजै मन आसा॥ हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जाय बखानी॥ मातंगी धूमावति माता। भुवनेस्वरि बगला सुख दाता॥ श्री भैरव तारा जग तारिनि। छिन्नभाल भव दु:ख निवारिनि॥ केहरि बाहन सोह भवानी। लांगुर बीर चलत अगवानी॥ कर में खप्पर खडग बिराजै। जाको देख काल डर भाजै॥ सोहै अस्त्र और तिरसूला। जाते उठत शत्रु हिय सूला॥ नगरकोट में तुम्ही बिराजत। तिहूँ लोक में डंका बाजत॥ शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्त बीज संखन संहारे॥ महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥ रूप कराल काली को धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥ परी गाढ संतन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥ अमर पुरी औरों सब लोका। तव महिमा सब रहै असोका॥ ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नरनारी॥ प्रेम भक्ति से जो जस गावै। दुख दारिद्र निकट नहि आवै॥ ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म मरन ताको छुटि जाई॥ जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। जोग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥ शङ्कर आचारज तप कीन्हो। काम क्रोध जीति सब लीन्हो॥ निसिदिन ध्यान धरो शङ्कर को। काहु काल नहि सुमिरो तुमको॥ शक्ति रूप को मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥ सरनागत ह्वै कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदंब भवानी॥ भई प्रसन्न आदि जगदंबा। दई शक्ति नहि कीन्ह बिलंबा॥ मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरे दुख मेरो॥ आसा तृस्ना निपट सतावै। रिपु मूरख मोहि अति डरपावै॥ शत्रु नास कीजै महरानी। सुमिरौं एकचित तुमहि भवानी॥ करौ कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि सिद्धि दे करहु निहाला॥ जब लगि जियौं दयाफल पाऊँ। तुम्हरौ जस मैं सदा सुनाऊँ॥ दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परम पद पावै॥ देवीदास सरन निज जानी। करहु कृपा जगदंब भवानी॥ श्री दुर्गा जी की आरती जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय! भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय। जगजननी .. तू ही सत्-चित्-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा। सत्य सनातन, सुन्दर पर-शिव सुर-भूपा॥ जगजननी .. आदि अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी। अमल, अनन्त, अगोचर, अज आनन्दराशी॥ जगजननी .. अविकारी, अघहारी, अकल कलाधारी। कर्ता विधि, भर्ता हरि, हर संहारकारी॥ जगजननी .. तू विधिवधू, रमा, तू उमा महामाया। मूल प्रकृति, विद्या तू, तू जननी जाया॥ जगजननी .. राम, कृष्ण तू, सीता, ब्रजरानी राधा। तू वा†छाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाघा॥ जगजननी .. दश विद्या, नव दुर्गा नाना शस्त्रकरा। अष्टमातृका, योगिनि, नव-नव रूप धरा॥ जगजननी .. तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू। तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू॥ जगजननी .. सुर-मुनि मोहिनि सौम्या, तू शोभाधारा। विवसन विकट सरुपा, प्रलयमयी, धारा॥ जगजननी .. तू ही स्नेहसुधामयी, तू अति गरलमना। रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि तना॥ जगजननी .. मूलाधार निवासिनि, इह-पर सिद्धिप्रदे। कालातीता काली, कमला तू वरदे॥ जगजननी .. शक्ति शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी। भेद प्रदर्शिनि वाणी विमले! वेदत्रयी॥ जगजननी .. हम अति दीन दु:खी माँ! विपत जाल घेरे। हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे॥ जगजननी .. निज स्वभाववश जननी! दयादृष्टि कीजै। करुणा कर करुणामयी! चरण शरण दीजै॥ जगजननी .. (2) अम्बे तू है जगदम्बे, काली जय दुर्गे खप्पर वाली। तेरे ही गुण गाएं भारती॥ |
माँ सरस्वती जी की आरती
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| आरती कीजै सरस्वती की, जननि विद्या बुद्धि भक्ति की। आरती .. जाकी कृपा कुमति मिट जाए। सुमिरन करत सुमति गति आये, शुक सनकादिक जासु गुण गाये। वाणि रूप अनादि शक्ति की॥ आरती .. नाम जपत भ्रम छूट दिये के। दिव्य दृष्टि शिशु उधर हिय के। मिलहिं दर्श पावन सिय पिय के। उड़ाई सुरभि युग-युग, कीर्ति की। आरती .. रचित जासु बल वेद पुराणा। जेते ग्रन्थ रचित जगनाना। तालु छन्द स्वर मिश्रित गाना। जो आधार कवि यति सती की॥ आरती .. सरस्वती की वीणा-वाणी कला जननि की॥ आरती.. |
माँ वैष्णो देवी जी की आरती
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| जय वैष्णवी माता,मैया जय वैष्णवी माता। द्वार तुम्हारे जो भी आता, बिन माँगे सबकुछ पा जाता॥ जय .. तू चाहे जो कुछ भी कर दे, तू चाहे तो जीवन दे दे। राजा रंग बने तेरे चेले, चाहे पल में जीवन ले ले॥ जय .. मौत-जिंदगी हाथ में तेरे मैया तू है लाटां वाली। निर्धन को धनवान बना दे मैया तू है शेरा वाली॥ जय .. पापी हो या हो पुजारी, राजा हो या रंक भिखारी। मैया तू है जोता वाली, भवसागर से तारण हारी॥ जय .. तू ने नाता जोड़ा सबसे, जिस-जिस ने जब तुझे पुकारा। शुद्ध हृदय से जिसने ध्याया, दिया तुमने सबको सहारा॥ जय .. मैं मूरख अज्ञान अनारी, तू जगदम्बे सबको प्यारी। मन इच्छा सिद्ध करने वाली, अब है ब्रज मोहन की बारी॥ जय .. सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी, तेरा पार न पाया। पान, सुपारी, ध्वजा, नारियल ले तेरी भेंट चढ़ाया॥ सुन मेरी .. सुआ चोली तेरे अंग विराजे, केसर तिलक लगाया। ब्रह्मा वेद पढ़े तेरे द्वारे, शंकर ध्यान लगाया। नंगे पांव पास तेरे अकबर सोने का छत्र चढ़ाया। ऊंचे पर्वत बन्या शिवाली नीचे महल बनाया॥ सुन मेरी .. सतयुग, द्वापर, त्रेता, मध्ये कलयुग राज बसाया। धूप दीप नैवेद्य, आरती, मोहन भोग लगाया। ध्यानू भक्त मैया तेरा गुणभावे, मनवांछित फल पाया॥ सुन मेरी |
श्री सत्यनारायण जी की आरती
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| जय लक्ष्मी रमणा, जय लक्ष्मी रमणा। सत्यनारायण स्वामी जन पातक हरणा॥ जय .. रत्न जडि़त सिंहासन अद्भुत छवि राजै। नारद करत निरंतर घण्टा ध्वनि बाजै॥ जय .. प्रकट भये कलि कारण द्विज को दर्श दियो। बूढ़ा ब्राह्मण बनकर कंचन महल कियो॥ जय .. दुर्बल भील किरातनी , जिन पर कृपा करी। चन्द्रचूड़ एक राजा जिनकी विपत्ति हरी॥ जय .. वैश्य मनोरथ पायो श्रद्धा तज दीन्ही । सो फल भोग्यो प्रभु जी फिर स्तुति कीन्हीं॥ जय .. भाव भक्ति के कारण छिन-छिन रूप धरयो। श्रद्धा धारण कीनी, तिनको काज सरयो॥ जय .. ग्वाल बाल संग राजा वन में भक्ति करी। मनवांछित फल दीन्हों दीनदयाल हरी॥ जय .. चढ़त प्रसाद सवायो कदली फल, मेवा। धूप दीप तुलसी से राजी सत्य देवा॥ जय .. श्री सत्यनारायण जी की आरती जो कोई गावै। सुख सम्पत्ति और मनवांछित फल पावै॥ जय ॥ |
ॐ जय जगदीश हरे : विष्णु जी की आरती
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| जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे। भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ जय .. जो ध्यावै फल पावै, दु:ख बिनसै मनका। सुख सम्पत्ति घर आवै, कष्ट मिटै तनका॥ जय .. मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ जय .. तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ जय .. तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ जय .. तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति ।। जय .. दीनबन्धु, दु:खहर्ता ठाकुर तुम मेरे। अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ जय .. विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा-भक्ति बढाओ, संतन की सेवा॥ जय .. जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे। |
श्री शिव चालीसा
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| अज अनादि अविगत अलख, अकल अतुल अविकार। बंदौं शिव-पद-युग-कमल अमल अतीव उदार॥ आर्तिहरण सुखकरण शुभ भक्ति -मुक्ति -दातार। करौ अनुग्रह दीन लखि अपनो विरद विचार॥ पर्यो पतित भवकूप महँ सहज नरक आगार। सहज सुहृद पावन-पतित, सहजहि लेहु उबार॥ पलक-पलक आशा भर्यो, रह्यो सुबाट निहार। ढरौ तुरन्त स्वभाववश, नेक न करौ अबार॥ जय शिव शङ्कर औढरदानी। जय गिरितनया मातु भवानी॥ सर्वोत्तम योगी योगेश्वर। सर्वलोक-ईश्वर-परमेश्वर॥ सब उर प्रेरक सर्वनियन्ता। उपद्रष्टा भर्ता अनुमन्ता॥ पराशक्ति -पति अखिल विश्वपति। परब्रह्म परधाम परमगति॥ सर्वातीत अनन्य सर्वगत। निजस्वरूप महिमामें स्थितरत॥ अंगभूति-भूषित श्मशानचर। भुजंगभूषण चन्द्रमुकुटधर॥ वृषवाहन नंदीगणनायक। अखिल विश्व के भाग्य-विधायक॥ व्याघ्रचर्म परिधान मनोहर। रीछचर्म ओढे गिरिजावर॥ कर त्रिशूल डमरूवर राजत। अभय वरद मुद्रा शुभ साजत॥ तनु कर्पूर-गोर उज्ज्वलतम। पिंगल जटाजूट सिर उत्तम॥ भाल त्रिपुण्ड्र मुण्डमालाधर। गल रुद्राक्ष-माल शोभाकर॥ विधि-हरि-रुद्र त्रिविध वपुधारी। बने सृजन-पालन-लयकारी॥ तुम हो नित्य दया के सागर। आशुतोष आनन्द-उजागर॥ अति दयालु भोले भण्डारी। अग-जग सबके मंगलकारी॥ सती-पार्वती के प्राणेश्वर। स्कन्द-गणेश-जनक शिव सुखकर॥ हरि-हर एक रूप गुणशीला। करत स्वामि-सेवक की लीला॥ रहते दोउ पूजत पुजवावत। पूजा-पद्धति सबन्हि सिखावत॥ मारुति बन हरि-सेवा कीन्ही। रामेश्वर बन सेवा लीन्ही॥ जग-जित घोर हलाहल पीकर। बने सदाशिव नीलकंठ वर॥ असुरासुर शुचि वरद शुभंकर। असुरनिहन्ता प्रभु प्रलयंकर॥ नम: शिवाय मन्त्र जपत मिटत सब क्लेश भयंकर॥ जो नर-नारि रटत शिव-शिव नित। तिनको शिव अति करत परमहित॥ श्रीकृष्ण तप कीन्हों भारी। ह्वै प्रसन्न वर दियो पुरारी॥ अर्जुन संग लडे किरात बन। दियो पाशुपत-अस्त्र मुदित मन॥ भक्तन के सब कष्ट निवारे। दे निज भक्ति सबन्हि उद्धारे॥ शङ्खचूड जालन्धर मारे। दैत्य असंख्य प्राण हर तारे॥ अन्धकको गणपति पद दीन्हों। शुक्र शुक्रपथ बाहर कीन्हों॥ तेहि सजीवनि विद्या दीन्हीं। बाणासुर गणपति-गति कीन्हीं॥ अष्टमूर्ति पंचानन चिन्मय। द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग ज्योतिर्मय॥ भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा। अकथ अचिन्त्य असीम अनूपा॥ काशी मरत जंतु अवलोकी। देत मुक्ति -पद करत अशोकी॥ भक्त भगीरथ की रुचि राखी। जटा बसी गंगा सुर साखी॥ रुरु अगस्त्य उपमन्यू ज्ञानी। ऋषि दधीचि आदिक विज्ञानी॥ शिवरहस्य शिवज्ञान प्रचारक। शिवहिं परम प्रिय लोकोद्धारक॥ इनके शुभ सुमिरनतें शंकर। देत मुदित ह्वै अति दुर्लभ वर॥ अति उदार करुणावरुणालय। हरण दैन्य-दारिद्रय-दु:ख-भय॥ तुम्हरो भजन परम हितकारी। विप्र शूद्र सब ही अधिकारी॥ बालक वृद्ध नारि-नर ध्यावहिं। ते अलभ्य शिवपद को पावहिं॥ भेदशून्य तुम सबके स्वामी। सहज सुहृद सेवक अनुगामी॥ जो जन शरण तुम्हारी आवत। सकल दुरित तत्काल नशावत॥ दोहा बहन करौ तुम शीलवश, निज जनकौ सब भार। गनौ न अघ, अघ-जाति कछु, सब विधि करो सँभार॥ तुम्हरो शील स्वभाव लखि, जो न शरण तव होय। तेहि सम कुटिल कुबुद्धि जन, नहिं कुभाग्य जन कोय॥ दीन-हीन अति मलिन मति, मैं अघ-ओघ अपार। कृपा-अनल प्रगटौ तुरत, करो पाप सब छार॥ कृपा सुधा बरसाय पुनि, शीतल करो पवित्र। राखो पदकमलनि सदा, हे कुपात्र के मित्र॥ |
जय शिव ॐ कारा : शिव आरती
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| जय शिव ओंकारा, भज शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव अर्द्धांगी धारा॥ ...ॐ हर हर हर महादेव॥ एकानन, चतुरानन, पंचानन राजै। हंसासन, गरुडासन, वृषवाहन साजै॥ ॐ हर हर हर महादेव॥ दो भुज चारु चतुर्भुज, दशभुज ते सोहे। तीनों रूप निरखता, त्रिभुवन-जन मोहे॥ अक्षमाला, वनमाला, रुण्डमाला धारी। त्रिपुरारी, कंसारी, करमाला धारी। श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघाम्बर अंगे। सनकादिक, गरुडादिक, भूतादिक संगे॥ कर मध्ये सुकमण्डलु, चक्र शूलधारी। सुखकारी, दुखहारी, जग पालनकारी॥ ब्रह्माविष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका। त्रिगुणस्वामिकी आरती जो कोई नर गावै। कहत शिवानन्द स्वामी मनवान्छित फल पावै॥ ............................................................................... (2) हर हर हर महादेव। सत्य, सनातन, सुन्दर शिव! सबके स्वामी। अविकारी, अविनाशी, अज, अन्तर्यामी॥ हर हर . आदि, अनन्त, अनामय, अकल कलाधारी। अमल, अरूप, अगोचर, अविचल, अघहारी॥ हर हर.. ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, तुम त्रिमूर्तिधारी। कर्ता, भर्ता, धर्ता तुम ही संहारी॥ हरहर .. रक्षक, भक्षक, प्रेरक, प्रिय औघरदानी। साक्षी, परम अकर्ता, कर्ता, अभिमानी॥ हरहर .. मणिमय भवन निवासी, अति भोगी, रागी। सदा श्मशान विहारी, योगी वैरागी॥ हरहर .. छाल कपाल, गरल गल, मुण्डमाल, व्याली। चिताभस्मतन, त्रिनयन, अयनमहाकाली॥ हरहर .. प्रेत पिशाच सुसेवित, पीत जटाधारी। विवसन विकट रूपधर रुद्र प्रलयकारी॥ हरहर .. शुभ्र-सौम्य, सुरसरिधर, शशिधर, सुखकारी। अतिकमनीय, शान्तिकर, शिवमुनि मनहारी॥ हरहर .. निर्गुण, सगुण, निर†जन, जगमय, नित्य प्रभो। कालरूप केवल हर! कालातीत विभो॥ हरहर .. सत्, चित्, आनन्द, रसमय, करुणामय धाता। प्रेम सुधा निधि, प्रियतम, अखिल विश्व त्राता। हरहर .. हम अतिदीन, दयामय! चरण शरण दीजै। सब विधि निर्मल मति कर अपना कर लीजै। हरहर .. (3) शीश गंग अर्धग पार्वती सदा विराजत कैलासी। नंदी भृंगी नृत्य करत हैं, धरत ध्यान सुखरासी॥ शीतल मन्द सुगन्ध पवन बह बैठे हैं शिव अविनाशी। करत गान-गन्धर्व सप्त स्वर राग रागिनी मधुरासी॥ यक्ष-रक्ष-भैरव जहँ डोलत, बोलत हैं वनके वासी। कोयल शब्द सुनावत सुन्दर, भ्रमर करत हैं गुंजा-सी॥ कल्पद्रुम अरु पारिजात तरु लाग रहे हैं लक्षासी। कामधेनु कोटिन जहँ डोलत करत दुग्ध की वर्षा-सी॥ सूर्यकान्त सम पर्वत शोभित, चन्द्रकान्त सम हिमराशी। नित्य छहों ऋतु रहत सुशोभित सेवत सदा प्रकृति दासी॥ ऋषि मुनि देव दनुज नित सेवत, गान करत श्रुति गुणराशी। ब्रह्मा, विष्णु निहारत निसिदिन कछु शिव हमकू फरमासी॥ ऋद्धि सिद्ध के दाता शंकर नित सत् चित् आनन्दराशी। जिनके सुमिरत ही कट जाती कठिन काल यमकी फांसी॥ त्रिशूलधरजी का नाम निरन्तर प्रेम सहित जो नरगासी। दूर होय विपदा उस नर की जन्म-जन्म शिवपद पासी॥ कैलाशी काशी के वासी अविनाशी मेरी सुध लीजो। सेवक जान सदा चरनन को अपनी जान कृपा कीजो॥ तुम तो प्रभुजी सदा दयामय अवगुण मेरे सब ढकियो। सब अपराध क्षमाकर शंकर किंकर की विनती सुनियो॥ (4) अभयदान दीजै दयालु प्रभु, सकल सृष्टि के हितकारी। भोलेनाथ भक्त-दु:खगंजन, भवभंजन शुभ सुखकारी॥ दीनदयालु कृपालु कालरिपु, अलखनिरंजन शिव योगी। मंगल रूप अनूप छबीले, अखिल भुवन के तुम भोगी॥ वाम अंग अति रंगरस-भीने, उमा वदन की छवि न्यारी। भोलेनाथ असुर निकंदन, सब दु:खभंजन, वेद बखाने जग जाने। रुण्डमाल, गल व्याल, भाल-शशि, नीलकण्ठ शोभा साने॥ गंगाधर, त्रिसूलधर, विषधर, बाघम्बर, गिरिचारी। भोलेनाथ .. यह भवसागर अति अगाध है पार उतर कैसे बूझे। ग्राह मगर बहु कच्छप छाये, मार्ग कहो कैसे सूझे॥ नाम तुम्हारा नौका निर्मल, तुम केवट शिव अधिकारी। भोलेनाथ .. मैं जानूँ तुम सद्गुणसागर, अवगुण मेरे सब हरियो। किंकर की विनती सुन स्वामी, सब अपराध क्षमा करियो॥ तुम तो सकल विश्व के स्वामी, मैं हूं प्राणी संसारी। भोलेनाथ .. काम, क्रोध, लोभ अति दारुण इनसे मेरो वश नाहीं। द्रोह, मोह, मद संग न छोडै आन देत नहिं तुम तांई॥ क्षुधा-तृषा नित लगी रहत है, बढी विषय तृष्णा भारी। भोलेनाथ .. तुम ही शिवजी कर्ता-हर्ता, तुम ही जग के रखवारे। तुम ही गगन मगन पुनि पृथ्वी पर्वतपुत्री प्यारे॥ तुम ही पवन हुताशन शिवजी, तुम ही रवि-शशि तमहारी। भोलेनाथ पशुपति अजर, अमर, अमरेश्वर योगेश्वर शिव गोस्वामी। वृषभारूढ, गूढ गुरु गिरिपति, गिरिजावल्लभ निष्कामी। सुषमासागर रूप उजागर, गावत हैं सब नरनारी। भोलेनाथ .. महादेव देवों के अधिपति, फणिपति-भूषण अति साजै। दीप्त ललाट लाल दोउ लोचन, आनत ही दु:ख भाजै। परम प्रसिद्ध, पुनीत, पुरातन, महिमा त्रिभुवन-विस्तारी। भोलेनाथ .. ब्रह्मा, विष्णु, महेश, शेष मुनि नारद आदि करत सेवा। सबकी इच्छा पूरन करते, नाथ सनातन हर देवा॥ भक्ति, मुक्ति के दाता शंकर, नित्य-निरंतर सुखकारी। भोलेनाथ .. महिमा इष्ट महेश्वर को जो सीखे, सुने, नित्य गावै। अष्टसिद्धि-नवनिधि-सुख-सम्पत्ति स्वामीभक्ति मुक्ति पावै॥ श्रीअहिभूषण प्रसन्न होकर कृपा कीजिये त्रिपुरारी। भोलेनाथ .. |
श्रीहनुमानचालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक
| श्रीहनुमानचालीसा |
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| दोहा श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥ बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥ चौपाई जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥ महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥ कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥ हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥ संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥ बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥ सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥ भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे॥ लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥ रघुपति कीन्ही बहुत बडाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥ सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥ सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥ जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥ तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा। तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥ जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥ प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही। जलधि लाँधि गये अचरज नाहीं॥ दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥ राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥ सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥ आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥ भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥ नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥ संकट तें हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥ सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥ और मनोरथ जो कोइ लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥ चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥ साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥ अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥ राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥ तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥ अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥ और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥ संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥ जै जै जै हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरु देव की नाई॥ जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥ जो यह पढै हनुमान चलीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥ तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥ दोहा पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥ * संकटमोचन हनुमानाष्टक मत्तगयन्द छन्द बाल समय रबि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो। ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो॥ देवन आनि करी बिनती तब छाँडि दियो रबि कष्ट निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥1॥ बालि की त्रास कपीस बसे गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो। चौंकि महा मुनि साप दियो तब चाहिय कौन बिचार बिचारो॥ कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो॥2॥ को नहिं. अंगद के सँग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो। जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो॥ हरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया-सुधि प्रान उबारो॥3॥ को नहिं.. रावन त्रास दई सिय को सब राक्षसि सों कहि सोक निवारो। ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो॥ चाहत सीय असोक सों आगि सु दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो॥4॥ को नहिं.. बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो। लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो॥ आनि सजीवन हाथ दई तब लछिमन के तुम प्रान उबारो॥5॥ को नहिं.. रावन जुद्ध अजान कियो तब नाग की फाँस सबे सिर डारो। श्रीरघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो॥ आनि खगेस तबै हनुमान जु बंधन काटि सुत्रास निवारो॥6॥ को नहिं.. बंधु समेत जबै अहिरावन लै रघुनाथ पताल सिधारो। देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो॥ जाय सहाय भयो तब ही अहिरावन सैन्य समेत सँहारो॥7॥ को नहिं.. काज किये बड देवन के तुम बीर महाप्रभु देखि बिचारो। कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहिं जात है टारो॥ बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो॥8॥ को नहिं.. दोहा :- लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर। बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥ श्री हनुमान ललाजी की आरती आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्टदलन रघुनाथ कला की। जाके बल से गिरिवर कांपै। रोग दोष जाके निकट न झांपै। अंजनिपुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई। दे बीरा रघुनाथ पठाये। लंका जारि सीय सुधि लाये। लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई। लंका जारि असुर संहारे। सीतारामजी के काज संवारे। लक्ष्मण मूर्छित पडे सकारे। आनि सजीवन प्राण उबारे। पैठि पताल तोरि जम कारे। अहिरावण की भुजा उखारे। बायें भुजा असुरदल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे। सुर नर मुनि आरती उतारे। जय जय जय हनुमान उचारे। कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई। जो हनुमान जी की आरती गावै। बसि बैकुण्ठ परम पद पावै। |
Wednesday, January 20, 2010
प्रेरक कथा : कष्टों में धैर्य रखें
A number of frogs were traveling through the woods. Two of them fell into a deep pit. All the other frogs gathered around the pit. When they saw how deep the pit was, they told the two frogs that they were as good as dead.The two frogs ignored the comments and tried to jump up out of the pit with all of their might. The other frogs kept telling them to stop, that they were as good as dead.
Finally, one of the frogs took heed to what the other frogs were saying and gave up. He fell down and died.
The other frog continued to jump as hard as he could. Once again, the crowd of frogs yelled at him to stop the pain and just die. He jumped even harder and finally made it out.
When he got out, the other frogs said, "Did you not hear us?" The frog explained to them that he was deaf. He thought they were encouraging him the entire time.
This story teaches two great lessons:
There is the power of life and death in the tongue. An encouraging word to someone who is down can lift them up and help them make it through the day.
A destructive word to someone who is down can be the push over the edge. Be careful of what you say. Speak life to those who cross your path. Anyone can speak words that can rob another of the spirit to push forward in difficult times.
Special is the individual who will take the time to encourage another.
वसंत पंचमी : सरस्वती वंदना : २० जनवरी २०१०
या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्र वस्त्र आवृता ।

या वीणा वर दंड मंडित करा या श्वेत पद्मासना । ।
या ब्रह्मा अच्युत शंकर प्रभृति भिर्देविः सदावंदिता ।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा । ।
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* अर्थ :जो कुंद फूल, चंद्रमा और बर्फ के हार के समान श्वेत हैं, जो शुभ्र वस्त्र धारण करती हैं| जिनके हाथ, श्रेष्ठ वीणा से सुशोभित हैं, जो श्वेत कमल पर आसन ग्रहण करती हैं|ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदिदेव, जिनकी सदैव स्तुति करते हैं| हे माँ भगवती सरस्वती, आप मेरी सारी (मानसिक) जड़ता को हरें|
। । वंदना । ।
शुक्लां ब्रह्म विचार-सार-परम आमाद्यं जगत व्यापिनीं ।
वीणा पुस्तक धारिनीम भयदां जाड्या अन्धकार अपहां । ।
हस्ते स्फटिक मालिकां विदधतीं पद्म आसने संस्थितां ।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदां । ।
सरस्वती महाभागे विद्ये कमल लोचने ।
विद्या रूपे विशाल अक्षे विद्यां देहि नमो: स्तुते । ।
Tuesday, January 19, 2010
नित्य सत्संग सुनो !
बुद्धि के दो विभाग किया गए है !एक है अनुभूति और दूसरा है स्मृति ! पहले अनुभव करना और फ़िर उसकी याद करना ! प्रत्येक अनुभव को मन चुरा लेता है, और उसे चुरा कर काल के गर्त में डाल देता है ! जिसको मन नही चुरा पाता, वह है स्मृति !हम पूर्व जन्म में मनुष्य, पक्षी, या पशु क्या थे, मन पर माया का पर्दा पद जाता है ! सब विस्मृत हो जाता है ! मन बहुत बड़ा चोर है ! सबसे पहले ये हमारी विवेक को हर लेता है ! जिससे स्मृति पर पर्दा पड़ जाता है ! स्मृति पर पर्दा पड़ते ही बुद्वि भी नष्ट हो जाती है ! बुद्वि नष्ट होते ही ज्ञान भी नष्ट हो जाता है ! फ़िर जीव के पास काम क्रोध लोभ आदि सब आ जाते है क्योंकि बुद्वि नष्ट हो चुकी है ! बुद्वि ही इन सब को नियंत्रण रखती है ! इस बुद्वि का शोधन एक मात्र सत्संग से ही सम्भव है !Monday, January 18, 2010
आपका भविष्य : जनवरी २०१०
वृष ( TAURUS):- आजीविका और रोजगार के लिए यह महीना युवा जातकों के लिए भाग्योदयकारी होगा। रोजगार की तलाश पूरी होगी। हाल ही में शुरू किए गए व्यवसाय या छोटे स्तर की सेवा परियोजना से भी आमदनी के आसार नजर आएंगे। काई व्यक्ति आप पर भारी उपकार करेगा। इस महीने के उत्तरार्ध में आप कुछ विस्मयकारी घटनाओं के बीच अपने साहस को देखेंगे और किसी नए जीवन की वरदान राशि को लेकर चमत्कृत होंगे। अनेक महानुभाव अपने परिश्रम और चेष्टाओं के सिद्धकारक परिणाम भी महसूस करेंगे।
मिथुन ( GEMINI):- इस महीने का पहला हिस्सा भी शुभ गोचर से युक्त है। लाभकारी योजनाओं में धन लगाना उचित रहेगा। किसी मांगलिक कार्य या उत्सव में धन खर्च होगा। अच्छे स्वास्थ्य और स्फूर्ति के संचार होने से कष्टप्रद और जोखिम कार्य भी सरलता से बनते नजर आएंगे। बाद के हिस्से में सीनियर्स के प्रति जिम्मेदारियां पूरी होंगी। परन्तु कुछ जातकों का स्वास्थ्य बिगड़ जाने से उनके काम में बाधा आ सकती है। किसी कार्य विशेष के न बन पाने से पैसे की चिंता बनी रहेगी। सामाजिक क्षेत्रों में मान सम्मान की स्थिति यथावत बनी रहेगी। साल का पहला महीना कुछ रुकावटों के बाद भी सुख संतोष से बीत जाएगा।
कर्क ( CANCER):- इस महीने का पहला हिस्सा पत्नी , बेटे और भाइयों की ओर से कुछ आर्थिक संकट देने वाला होगा , फिर भी प्रभावशाली व्यक्ति और अच्छे सम्पर्क आपके काम आएंगे। बिजनस में आर्थिक स्थिति सुधरेगी। सुनियोजित कामों में समय पर लाभ होने लगेगा। महीने के दूसरे हिस्से में अच्छे संदेश और समाचार प्राप्त होंगे। उद्योग व्यापार को नई दिशा मिलेगी। काम बिगाड़ने वाले तत्व रोजमर्रा की जिंदगी से हट जाएंगे। निर्भय होकर आप अपने कामकाज को सफल बनाने में जुट जाएंगे।
सिंह ( LEO):- इस महीने का पहला हिस्सा काफी खर्च लेकर आएगा। शरीर में अचानक विकार या रोग पैदा हो सकते हैं। घर में मेहमान आदि के स्वागत में भी आडम्बरपूर्ण खर्च संभव है। आजीविका आदि में सहयोगियों के साथ तनाव और सीनियर अधिकारियों के बीच बहसबाजी से मान प्रतिष्ठा घट सकती है। इस महीने के दूसरे हिस्से में जब सूर्य आपकी छठी राशि पर संचार करेगा तो लोग आपके वक्तव्य को सत्य वचन कहकर स्वीकार कर लेंगे।
कन्या ( VIRGO) :- यह महीना अनुकूल वक्त और फायदों से भरपूर रहेगा। हालांकि स्वभाव में कुछ चंचलता आएगी , फिर भी आपके कहे गये शब्दों का सर्वत्र सम्मान होगा। आर्थिक पक्ष के अलावा आपका राजनीति दायरा भी इस बीच मजबूत होगा। जनमत और लोकमत के जरिए किसी प्रतिस्पर्धा में भी आप विजयी होंगे। इस महीने का दूसरा हिस्सा कुछ खर्चीला रहेगा और नुकसान भी करा सकता है।
तुला ( LIBRA):- इस महीने के आरंभ में विभिन्न प्रयासों , भरपूर परिश्रम और हितचिन्तकों के सहयोग से ही वांछित लाभ सम्भव होगा। एक साथ कई तरह के व्यापार या काम धन्धों में लाभ होगा। प्रतिस्पर्धा की दौड़ में आगे निकल जाएंगे। घर परिवार की व्यवस्था संतोषजनक रहेगी। विरोधियों और आलोचना करने वालों के मुंह बन्द रहेंगे। महीने का पिछला हिस्सा भी सुख सौभाग्य बढ़ाने वाला है।
वृश्चिक ( SCORPIO):- इस महीने के आरंभ में रुका धन प्राप्त होगा। नौकरी अथवा आजीविका में बदलाव की संभावना रहेगी। घर के दायरे में भी परिवर्तन की संभावना है। इस महीने के आखिरी हिस्से में निवेश किये गये धन का लाभ मिलेगा। बिजनस में तरक्की होगी। सज्जनों और सन्त महात्माओं के दर्शन लाभ करेंगे। बुजुर्गों और पैतृक संबंधों में सहयोग और प्रोत्साहन मिलेगा। किसी काम में मनोवांछित लाभ कुछ रुक - रुक कर होने से चिंताएं बढेंगी।
धनु ( SAGITTARIUS) :- इस महीने में गिरते कारोबार की ओर ध्यान दें। कार्य क्षेत्र की स्थिति असन्तोषजनक होगी। अधिकारी के व्यवहार से निराशा बढ़ेगी। पार्टनर के साथ वैचारिक मतभेद होगा। सुख में कमी होगी। मेहनत अधिक होगी। व्यस्तता बढ़ेगी। बौद्धिक श्रम बढ़ेगा। महीने के मध्य तक भाग्य साथ देगा। आत्मविश्वास से जिम्मेदारी पूरी कर सकेंगे। खर्च के कारण संतान के विवाह प्रस्तावों में निर्णय लेना कठिन हो सकता है। किसी व्यापारी मित्र से शत्रुता प्रतिष्ठा के लिए चुनौती बन जाएगी। परिश्रम से आय बढ़ेगी। धन - संग्रह होगा।
मकर ( CAPRICORN) :- इस महीने किसी मूल्यवान वस्तु के खर्च हो जाने से निराशा होगी। नये आदेश और काम का बोझ कष्टप्रद सिद्ध होगा। सम्भव है आजीविका बदलने का विचार बने। आपका व्यवहार खीझ भरा रहेगा। जो भी हो रहा है स्वयं को उससे अलग अनुभव करें। अपना ध्यान अन्य विषयों की ओर मोड़ देना ठीक होगा। बिजनस पार्टनर के व्यवहार में अप्रत्याशित बदलाव हो सकता है। सूझबूझ से स्थिति का लाभ उठाएं।
कुंभ ( AQUARIUS):- इस महीने का सम्पूर्ण भाग शक्तिशाली गोचर से युक्त है। देश विदेश की यात्रा या सम्पर्कों के माध्यम से आजीविका और व्यापार में उन्नति अर्जित करेंगे। समतुल्य लोगों में साख बढ़ेगी। किसी नये काम की प्रेरणा से धन और समय का निवेश भी सुनिश्चित होगा। परन्तु सूर्य प्रधान व्यक्ति आलस्य एवं दरिद्रता के शिकार होंगे। घर परिवार के बीच अनावश्यक झगड़े क्लेश आदि से खिन्नता होगी। इसी कारण धन की आवक भी समय पर नहीं हो पाएगी।
मीन ( PISCES) :- इस महीने का पहला हिस्सा व्यक्तिगत जीवन या कार्यक्षेत्र के विवादों को सुलझाने में बीतेगा। सहयोगी और मित्रों के काम और निष्ठा के प्रति शिकायत रहेगी। लापरवाही और अति विश्वास के कारण भी किसी प्रकार की हानि से आर्थिक कष्ट अनुभव करेंगे। सरकारी सर्विस से जुड़े हुए लोग उच्चाधिकारियों से विवाद बढ़ जाने के कारण चिंतित रहेंगे। महीने के दूसरे हिस्से में कार्यक्षेत्र और पराक्रम वृद्धि धीरे - धीरे सहायक होने लगेगी। विशेष प्रकार के कार्यभारों को निपटाने में सक्रियता रहेगी। घर - परिवार के बीच चिंता और अशांति का वातावरण छंट जाएगा।
Mohyal Youth
Come closer to the community through Mohyal Mitter and Mohyal website: www.mohyalonline.com
Outstanding achievers will be honored by GMS in their annual functions.
Secretary Youth and Cultural Affair, GMS
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Contact: +91-9811338000
Sunday, January 17, 2010
बाबा लाल जी : मोहयालों के गुरु देव

शक्ति के प्रतीक-श्री बाबा लाल दयाल जी
श्री रामानंद संप्रदाय ने अपने भूतकाल में बड़े बड़े सिद्धों को जन्म व आश्रय दिया है . महातापोनिष्ठ एवं शक्ति के प्रतीक के रूप में सतगुरु श्री बाबा लाल जी ऐसे हुए हैं , जिनकी छाप अनंत काल तक रहेगी. शाहजहाँ के बड़े बेटे दाराशिकोह ने अपने ग्रन्थ 'हस्नत-उल-आरिफिन' मेंलिखा हैं बाबा लाल एक आरुथ योगी हैं। उनके समान प्रभाव शाली व उच्च कोटि का संत-महात्मा हिन्दुओ में मैंने नहीं देखा है। मैंने स्वयं घंटों उनसे अनेक विषयों परचर्चा की है. उनसे वार्तालाप के बाद ही मुझे यह अनुभव हुआ.
श्री ध्यानपुर,बटाला,पंजाब जहाँ बाबा लाल जी की गद्दी है , एक ग्रन्थ इस बारे में इतिहास के साक्षी के रूप में में रखा हुआ है .
माघ शुक्ल पक्ष की द्वितीय को माँ कृष्णा देवी एवं पिता भोलानाथ जी के घर ग्राम कसूर(लाहौर) में पैदा हुए बाबा लाल जी इस धरती पर संवत 1412 से 1712 तक रहे,जिससे इनकी आयु 300 वर्ष रही। आठ वर्ष की आयु में ही इन्होनें शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था तथा दस वर्ष की आयु तक इनको वैराग्य हो गया था. इनको गुरु के रूप में उस समय के महान संत चैतन्य स्वामी जी मिले. कहा जाता है कि स्वामी को बाबा जी को देख कर कई वर्ष पूर्व समाधि में लीन होते वक्त की याद आ गयी कि आज एक महान आत्मा लाहौर के पास अवतरित हो रही है और तुम्हे ही उन्हें दिक्षा देनी होगी . बाबा लाल जी ने देश विदेशों में घूम कर जहाँ वैष्णव धर्म का प्रचार किया, वहीं सहारनपुर के जंगलों में लगभग सौ वर्षों तक रह कर इस धरती को अपने तप से पवित्र किया। प्रतिदिन योग विद्या के माध्यम से सुबह चार बजे हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए जाते थे. यहाँ पर बादशाह खिजर खान ने अनेक प्रकार से आपकी परीक्षा लेने के बाद स्वयं अपने मंत्रियो के साथ aआपके श्री चरणों में प्रस्तुत हुआ। उसने उनकी कुटिया के पास सौ बीगा जमीन दान में दे दी। आजकल यह स्थान बाबा लाल दास बाड़ा के नाम से जाना जाता है. शाही कागज़ात में आज भी यह दस्तावेज रिकॉर्ड है. सतगुरु का नियम था कि प्रतिदिन भिक्षा मांग कर ही अन्न का सेवन करना. पंजाब में किरण नदी के किनारे कलानोर के पास उन्होंने डेरा जमाया लिया. यहाँ से कुछ दूर महाभारत काल के राजा पुरु के किले में उस समय अराजकता थी। कहा जाता था कि वहाँ भूत प्रेतों का निवास था। बाबा जी ने अपने शिष्यों के साथ इस जगह को अपनी तपोस्थली बनाया. बाबा लाल जी ने अपने बाईस प्रमुख चेलो के साथ काबुल,गजनी,पेशावर,कंधार के आलावा पूरे भारत वर्ष में लोगों का मार्गदर्शन किया . आज पूरे भारत वर्ष के प्रत्येक शहर कसबे में बाबा लाल जी के मंदिर है जहाँ लाखो करोड़ों श्रद्धालु उनको नमन करते हैं. एक विशेष बात यह है कि अधिकाँश मोहयाल परिवार बाबा लाल जी को अपना गुरु मानते हैं. हरिद्वार,मथुरा में विशाल बाबा लाल आश्रम की स्थापना की गई है जहाँ पर ठहरने का हर तरह का प्रबंध है. अनेक इतिहासकारों तथा विद्वानों ने बाबा लाल जी पर शोध के बाद अनेक पुस्तकें लिखी है ।
*नरिंदर मेहता
पानीपत
Saturday, January 16, 2010
to re-organize the Mohyal Sabha at Sahibabad
with Profound regards
Prashant Bakhshi (jai Mohyal)
Friday, January 15, 2010
तुलसी के पत्ते और पापों का नाश :Tulasi leaves
.""By offering the Lord Tulasi leaves, a devotee is released from sins accumulated for one koti (ten million) lifetimes. When a devotee offers Tulasi to the Lord's head, all the devotee's unmentionable and undetected sins are destroyed. By sprinkling the Lord's house with water using a Tulasi leaf, one is freed from all great sins. A person who has Tulasi leaves in his mouth or on his head or body when he dies is guaranteed not to suffer in hell."
Even our subsequent departure from this world would not alleviate our distress, because the cycle of birth and death is endless. Only Self-knowledge can free us from miseries. Self-knowledge can be achieved by living right. According to the Vedas, there are four values that are to be cultivated by any individual for living right. That is, there are four main purposes to human life. They are: Moral perfection, worldly attainment, fulfillment of legitimate desires and liberation. The first three values have meaning only when they are aimed at the fourth one. Only when the major aim is liberation, can an individual remain centered while following the other three tenets, else he may tend to become arrogant, greedy, power-hungry and immoral.
We live a life of moral perfection when we live in tune with our real Self, thereby always being in tune with the rhythm of life. We discover how to function in an optimum manner, and have the full support of Providence to evolve because Nature is always inclined towards progression. This is also known as ‘the righteous way to live’. All our behaviours then become constructive, life enhancing and appropriate.
When we have a harmonious relationship with the Universe, it provides for all our needs. Whatever is required to make our lives satisfying, unfolds spontaneously. We are always in the flow of harmonious relationships and supportive circumstances. But we should also cultivate the faith that whatever is showing up is for our highest good. Impatience does not have spiritual virtue. With unshakeable faith in God, we should be joyous and enthusiastic always.
When our life-enhancing, legitimate desires are fulfilled, life is fulfilling, enjoyable and we can devote ourselves to higher learning and practice. As spiritual beings we have this ability to have our desires fulfilled by gentle intention. We do not have to apply great effort or struggle to have them fulfilled. As our awareness increases we are naturally in a state of fulfillment. We only need to acknowledge our desires and have complete faith that they will be soon fulfilled.
As spiritual beings we cannot be satisfied only living a life of contentment, worldly attainment and having our desires fulfilled. Without spiritual unfolding of our consciousness, we would always remain disgruntled and despite the fulfillment of the first three ideals, we would still be prone to getting waylaid. The first three practices make our lives satisfying so we can devote ourselves to the fourth and most important ideal. All four resolutions are interrelated and work in conjunction. We can demonstrate commitment to spiritual practice by making it the focal point of our lives. All actions and thoughts should be conducted from that platform. As we keep progressing on our path with full dedication, we are forever assured of God’s grace.